Released in 1986, Jaanbaaz remains one of the most stylish and ambitious films of 1980s Hindi cinema. Produced and directed by Feroz Khan, the film blended family drama, romance, action, and crime within a visually lavis...
View on Facebookपूना के सबसे बड़े सेठ धनराज के पास भगवान का दिया सब कुछ था, लेकिन वंश चलाने के लिये एक लड़के की चाहत थी
भगावन ने उनकी प्रार्थना सुनी और मीनू के बाद मुन्ना ने जन्म लिया। घर खुशियों से लहलहा उठा। लोगों को लगा कि इतनी खुशी संसार के किसी घर में नहीं।
फिर न जाने किसकी नज़र लगी कि इस घर पर दुःखों के बादल छा गये। एक दिन मुन्ने को आग से बचाते हुये धनराज की पत्नी आग में जल मरी। घर के वफ़ादार नौकर रामू और मीनू के जिद करने पर धनराज ने दूसरी शादी की। मुन्ना के लिये मां पाकर मीनू बहुत खुश हुई। लेकिन लक्ष्मी के साथ साथ उसके भाई रघुनन्दन ने राहु बनकर इस घर में प्रवेश किया। उसने लक्ष्मी के कान भरे। घर के वफ़ादार नौकर रामू पर चोरी का इल्ज़ाम लगाकर उसे घर से बाहर निकाल दिया। बच्चों को मार डालने की कोशिश की। मीनू को पता चल गया और वह भाई की जान बचाने के लिये उसे लेकर घर से भाग गई। धनराज जब लण्डन से लौटा और उसे बच्चों के मरने की झूठी खबर दी गई तो वह अपने होश हवास खो बैठा।
उधर उसकी बेटी मीनू (आशा) ने मां बनकर अपने भाई को पाला पोसा बड़ा किया। सड़को पर नाच गाकर उसने अपने भाई को डिग्री दिलाई। डिग्री मिलने के बाद आशा ने नाच छोड़ देने का जो वचन दिया था निभाने के स्वीकृती दे दी। केतन को नौकरी मिली और वह अपनी पहली तनख़्वाह लेकर बहन के लिये नाना प्रकार के अरमान सजाते चल पड़ा। उधर आशा को गुण्डों ने कोठे पर पहुँचा दिया। आशा को घर में न पाकर केतन पागलों की तरह उसे दर बदर ढूंढने निकल पड़ा।
केतन को जान से मार डालने की धमकी दी गई तो मज़बूरन उसने पैरों में घुंघरू बांध लिये। बहन ने, भाई की जान बचाने के लिए, उस नरकिये जीवन को अपना लिया। उस नरकीये जीवन से छुटकारा पाने के लिये एक दिन आशा वहाँ से भाग निकली और रामू काका ने मुन्नी बाई के गुण्डों से उसे बचा लिया। रामू को पहचान लिया और बेटी बनकर वह रामू के साथ रहने लगी। रामू के नये मालिक शिवप्रसाद के बेटे अमर ने आशा को वहां देखा और उसने उसे दिल में बसा लिया।
उधर रघुनन्दन ने धनराज जी की पूरी सम्पत्ति हड़प कर ली। हाथापाई में सीढ़ियों से नीचे गिरकर धनराज ने अपनी आंखे खो दी। वह लक्ष्मी तथा अपनी बेटी चंदा को लेकर अपने दोस्त शिवप्रसाद के पास बम्बई पहुंचा। शिवप्रसाद ने धनराज की बेटी चंदा को अपने घर की बहू बनाने का जो वचन दिया था उसे इस हालत में भी दोहराया। अमर ने विद्रोह किया और आशा से शादी करने की बात कही। नसीब का मारा धनराज वहां से निराश लौट पड़ा।
यह जानकर कि भाई ने मुझे आज भी माफ नहीं किया आशा वहां से लौट पड़ी। समाज के छिटा कसी से तंग आकर एक दिन केतन मुन्नी बाई के कोठे पर जा पहुंचा जहां आशा तो मिली नहीं लेकिन उसकी कुर्बानियों के सबूत वहां जाकर उसे मिले। केतन फफक कर रो पड़ा।
रामू अपने मालिक को सड़कों पर अन्धे हालत में देखकर विछला उठा और उन्हें अपने घर ले गया। आशा अपने अन्धे बाप को देख कर बिलख उठी। उसे सब मालूम हुआ। उसने उन्हें केतन के जिन्दा होने की ख़बर दी और केतन का पता बताकर उसके पास भेज दिया। फिर उसने खुद यहां से भाग जाने का फैसला किया। और घर छोड़कर निकल पड़ी।
इसके बाद क्या हुआ आशा का?
रघुनन्दन का क्या हुआ? धनराज के घर में फिर से खुशी लहलहाई या नहीं यह सब देखने के लिये आपको अपने शहर के सिनेमाघर में रूपहले पर्दे के सामने बैठना होगा।
[From the official press booklet]